अकलतरा में 68 वर्षों से जीवंत है बंगाल की दुर्गोत्सव परंपरा ,
रेलवे स्टेशन के सामने श्री श्री दुर्गा पूजा उत्सव समिति का भव्य आयोजन, 18 अक्टूबर को अष्टमी पर होगी संधि पूजा; रखिया एवं खीरा की दी जाएगी प्रतीकात्मक बलि
कोलकाता की तर्ज पर होती है माता की आराधना, 17 से 20 अक्टूबर तक राजनांदगांव की चलित झांकी रहेगी आकर्षण का केंद्र
अकलतरा – आस्था, श्रद्धा, भक्ति और सांस्कृतिक परंपराओं का अनूठा संगम माने जाने वाले दुर्गोत्सव का अकलतरा में इस वर्ष भी भव्य आयोजन किया जा रहा है। नगर के रेलवे स्टेशन के सामने स्थित श्री श्री दुर्गा पूजा उत्सव समिति के पंडाल में बंगाल की परंपरा और कोलकाता के दुर्गोत्सव की तर्ज पर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जा रही है। इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अकलतरा में दुर्गोत्सव की यह परंपरा वर्ष 1958 से निरंतर चली आ रही है। इस तरह नगर में बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और दुर्गा आराधना की परंपरा को जीवंत रहते हुए लगभग 68 वर्ष हो चुके हैं।
अविभाजित मध्य प्रदेश के समय रेलवे परिक्षेत्र में प्रारंभ हुआ यह दुर्गोत्सव आज अकलतरा की धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। शुरुआती दौर में बंगाली समाज के लोगों द्वारा स्थापित की गई इस परंपरा में अब नगर के विभिन्न समाजों के लोग भी उत्साहपूर्वक सहभागिता निभाते हैं। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा ने न केवल धार्मिक आस्था को मजबूत किया है, बल्कि विभिन्न समाजों के बीच आपसी सद्भाव, सांस्कृतिक एकता और भाईचारे को भी प्रोत्साहित किया है।
कोलकाता की तर्ज पर मां दुर्गा की प्रतिमा की स्थापना, पारंपरिक पूजा पद्धति, विशेष अनुष्ठान और अष्टमी के दिन होने वाली संधि पूजा इस आयोजन को विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं। दुर्गोत्सव के दौरान पंडाल में श्रद्धालुओं का आगमन शुरू हो जाता है और पूरा वातावरण माता की भक्ति एवं जयकारों से भक्तिमय हो उठता है।
षष्ठी से शुरू हुआ चार दिवसीय दुर्गोत्सव – 
श्री श्री दुर्गा पूजा उत्सव समिति द्वारा इस वर्ष 16 अक्टूबर को षष्ठी के अवसर पर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर चार दिवसीय दुर्गोत्सव का शुभारंभ किया गया। प्रतिमा स्थापना के साथ ही विधि-विधान से पूजा-अर्चना का क्रम प्रारंभ हो गया है। बंगाल की परंपरा के अनुरूप आयोजित इस महोत्सव में प्रत्येक दिन का अपना धार्मिक महत्व है।
17 अक्टूबर को सप्तमी के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना की जाएगी। इसके पश्चात 18 अक्टूबर को महाष्टमी के पावन अवसर पर संधि पूजा का आयोजन होगा, जिसे दुर्गोत्सव का अत्यंत महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाता है। इस दिन माता के चामुंडा स्वरूप की आराधना करते हुए विशेष धार्मिक विधियां संपन्न की जाएंगी। संधि पूजा के दौरान रखिया एवं खीरा की प्रतीकात्मक बलि अर्पित करने की परंपरा भी निभाई जाएगी।
19 अक्टूबर को नवमी के अवसर पर पंडाल में विशेष पूजा-अर्चना, हवन एवं अन्य धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होंगे। वहीं, 20 अक्टूबर को विजयादशमी के दिन पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ सिंदूरदान का आयोजन किया जाएगा। इस दौरान महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करने के साथ एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सुख, समृद्धि, सौभाग्य एवं मंगलमय जीवन की कामना करेंगी।
अष्टमी की संधि पूजा का विशेष धार्मिक महत्व –
दुर्गोत्सव में महाष्टमी और महानवमी के संधिकाल में की जाने वाली संधि पूजा का विशेष धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अष्टमी तिथि की समाप्ति और नवमी तिथि के प्रारंभ के बीच का विशेष समय संधिकाल कहलाता है। इसी अवधि में संधि पूजा संपन्न की जाती है।
परंपरागत गणना के अनुसार, अष्टमी तिथि के अंतिम 24 मिनट और नवमी तिथि के शुरुआती 24 मिनट को मिलाकर बनने वाले 48 मिनट के कालखंड को संधिक्षण माना जाता है। इसी विशेष समय में मां दुर्गा के उग्र एवं शक्तिशाली स्वरूप की आराधना की जाती है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब मां दुर्गा महिषासुर के विरुद्ध युद्ध कर रही थीं, तब चंड और मुंड नामक असुरों ने देवी पर आक्रमण किया। इससे देवी अत्यंत क्रोधित हुईं और उन्होंने चामुंडा का भयंकर स्वरूप धारण कर दोनों असुरों का वध किया। इसी पौराणिक प्रसंग की स्मृति में संधि पूजा के दौरान मां दुर्गा के चामुंडा स्वरूप की विशेष आराधना की जाती है।
संधि पूजा को शक्ति, साहस, बुराई पर अच्छाई की विजय और अधर्म के विनाश का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि बंगाल की दुर्गा पूजा परंपरा में इस अनुष्ठान को विशेष स्थान प्राप्त है। अकलतरा के रेलवे परिक्षेत्र में भी इसी पारंपरिक मान्यता के अनुरूप संधि पूजा की जाती है, जो इस आयोजन की विशिष्टता को और बढ़ाती है।
108 दीपों और बेलपत्र से होगी माता की विशेष आराधना –
संधि पूजा के अवसर पर मां दुर्गा को विभिन्न पारंपरिक पूजन सामग्री अर्पित की जाएगी। इस दौरान 108 दीप प्रज्वलित करने और 108 बेलपत्र अर्पित करने की परंपरा का विशेष महत्व है। इसके साथ ही माता को आभूषण, पारंपरिक वस्त्र, बिना पका हुआ अनाज, लाल फल और पुष्पमालाएं अर्पित की जाती हैं।
पूजा के दौरान श्रद्धालु मां दुर्गा के समक्ष दीप प्रज्वलित कर परिवार की सुख-समृद्धि, आरोग्य, शांति और कल्याण की कामना करते हैं। पारंपरिक विधि-विधान के साथ होने वाला यह अनुष्ठान श्रद्धालुओं के लिए गहरी आस्था और आध्यात्मिक अनुभूति का अवसर होता है।
इसी क्रम में रखिया एवं खीरा की प्रतीकात्मक बलि अर्पित की जाएगी। यह परंपरा धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा है और इसे देवी के प्रति श्रद्धा निवेदन तथा नकारात्मक शक्तियों के प्रतीकात्मक विनाश से जोड़कर देखा जाता है। संधि पूजा के दौरान होने वाले इन विशेष अनुष्ठानों को देखने और माता के दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह रहता है।
विजयादशमी पर होगा पारंपरिक सिंदूरदान –
दुर्गोत्सव का समापन 20 अक्टूबर को विजयादशमी के अवसर पर पारंपरिक धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ किया जाएगा। बंगाल की दुर्गा पूजा परंपरा में विजयादशमी का विशेष महत्व है। इस दिन मां दुर्गा को विदाई देने से पहले सिंदूरदान की परंपरा निभाई जाती है।
इस अवसर पर महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित कर उनके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करेंगी। इसके पश्चात एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सुख, सौभाग्य, समृद्धि और मंगलमय जीवन की कामना करेंगी। यह परंपरा नारी शक्ति, सौभाग्य और पारिवारिक मंगलकामना का प्रतीक मानी जाती है।
मां दुर्गा के चरणों के दर्शन के लिए दर्पण रखने की पारंपरिक विधि भी इस आयोजन का हिस्सा होगी। इस तरह विजयादशमी के दिन पूजा-अर्चना के साथ बंगाल की सांस्कृतिक परंपराओं की झलक देखने को मिलेगी।
राजनांदगांव की चलित झांकी रहेगी आकर्षण का केंद्र –
दुर्गोत्सव को और अधिक आकर्षक बनाने के लिए श्री श्री दुर्गा पूजा उत्सव समिति द्वारा राजनांदगांव से चलित झांकी मंगाई गई है। 17 से 20 अक्टूबर तक चलित झांकी का प्रदर्शन किया जाएगा। धार्मिक एवं सांस्कृतिक विषयों पर आधारित चलित झांकियां श्रद्धालुओं और दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहेंगी।
चलित झांकियों के माध्यम से धार्मिक प्रसंगों और सांस्कृतिक परंपराओं को आकर्षक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाएगा। दुर्गोत्सव के अवसर पर इस तरह के आयोजन धार्मिक वातावरण के साथ-साथ सांस्कृतिक मनोरंजन का अवसर भी प्रदान करते हैं। इससे बच्चों, युवाओं और परिवारों के बीच उत्सव को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिलता है।
रेलवे स्टेशन के सामने स्थित दुर्गा पूजा पंडाल में माता के दर्शन के साथ चलित झांकियों का आनंद लेने के लिए नगर एवं आसपास के क्षेत्रों से श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है।
68 वर्षों की परंपरा बनी अकलतरा की सांस्कृतिक पहचान –
अकलतरा में वर्ष 1958 में प्रारंभ हुआ यह दुर्गोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था, समर्पण और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। लगभग सात दशकों की इस यात्रा में समय के साथ अनेक बदलाव आए, लेकिन मां दुर्गा की आराधना और बंगाल की परंपरा को सहेजकर रखने का संकल्प कायम रहा।
इस आयोजन की खासियत यह भी है कि इसकी परंपरा अब किसी एक समाज तक सीमित नहीं रह गई है। विभिन्न समाजों के लोग माता के दर्शन करने, पूजा-अर्चना में शामिल होने और उत्सव की खुशियां साझा करने के लिए एकत्रित होते हैं। इससे सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता को बल मिलता है।
बंगाल की दुर्गा पूजा अपनी विशिष्ट पूजा पद्धति, भव्य पंडालों, पारंपरिक अनुष्ठानों और सामूहिक सहभागिता के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। अकलतरा में भी इसी सांस्कृतिक परंपरा की झलक देखने को मिलती है। संधि पूजा, 108 दीपों का महत्व, पारंपरिक पूजन सामग्री, प्रतीकात्मक बलि और विजयादशमी पर सिंदूरदान जैसे अनुष्ठान इस आयोजन को अन्य दुर्गोत्सव आयोजनों से अलग पहचान प्रदान करते हैं।
आस्था, परंपरा और सामाजिक एकता का संगम –
श्री श्री दुर्गा पूजा उत्सव समिति का यह आयोजन अकलतरा की धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। 68 वर्षों से चली आ रही परंपरा यह दर्शाती है कि समाज की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने में सामूहिक सहभागिता की अहम भूमिका होती है।
16 अक्टूबर को प्रतिमा स्थापना के साथ शुरू हुए इस महोत्सव में 17 अक्टूबर को सप्तमी की विशेष पूजा, 18 अक्टूबर को महाष्टमी की संधि पूजा, 19 अक्टूबर को नवमी का हवन-पूजन और 20 अक्टूबर को विजयादशमी के सिंदूरदान तक विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होंगे। इसी दौरान राजनांदगांव से आई चलित झांकियां भी चार दिनों तक श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहेंगी।
कुल मिलाकर, रेलवे स्टेशन के सामने आयोजित श्री श्री दुर्गा पूजा उत्सव अकलतरा में बंगाल की समृद्ध दुर्गोत्सव परंपरा को जीवंत बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। मां दुर्गा के प्रति अटूट आस्था, पारंपरिक पूजा पद्धति और सभी समाजों की सहभागिता से यह आयोजन नगर की सांस्कृतिक पहचान को और अधिक सशक्त बना रहा है।
