श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिवस सती चरित्र से लेकर प्रह्लाद चरित्र तक गूंजा भक्ति और संस्कार का संदेश
व्यासपीठ से अनुराग कृष्ण शास्त्री ने सुनाई भगवान की भक्ति, त्याग और अटूट श्रद्धा की प्रेरणादायी कथाएं
अकलतरा – कान्हा राइस प्रोडक्ट नया घर परिसर झलमला रोड नरियरा में जिंदल परिवार द्वारा आयोजित सात दिवसीय संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ के तीसरे दिवस कथा स्थल पर भक्ति और आध्यात्मिकता का अद्भुत वातावरण देखने को मिला, व्यासपीठ पर विराजमान प्रसिद्ध कथावाचक अनुराग कृष्ण शास्त्री ने श्रद्धालुओं को भगवान की भक्ति, धर्म, सत्य, त्याग, संयम और सदाचार का मार्ग बताते हुए सती चरित्र, ध्रुव चरित्र, जड़ भरत चरित्र एवं भक्त प्रह्लाद चरित्र का अत्यंत भावपूर्ण एवं विस्तारपूर्वक वर्णन किया। कथा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और भक्ति रस में सराबोर होकर भगवान के जयकारे लगाते रहे।
कथा की शुरुआत करते हुए अनुराग कृष्ण शास्त्री ने सती चरित्र का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि भगवान शिव और माता सती का संबंध केवल पति-पत्नी का नहीं, बल्कि आध्यात्मिक प्रेम, समर्पण और विश्वास का प्रतीक है। माता सती के पिता दक्ष प्रजापति द्वारा भगवान शिव के प्रति किए गए अपमान तथा यज्ञ में शिवजी को आमंत्रित नहीं किए जाने की कथा का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि जहां अहंकार जन्म लेता है, वहां धर्म और विवेक कमजोर पड़ने लगते हैं। माता सती ने अपने पति भगवान शिव के अपमान को सहन नहीं किया और अपने पिता के यज्ञ में देह त्याग दी।
शास्त्री ने श्रद्धालुओं को संदेश देते हुए कहा कि मनुष्य को कभी भी अहंकार में आकर किसी का अपमान नहीं करना चाहिए। पद, प्रतिष्ठा, धन और सामर्थ्य क्षणिक हैं, लेकिन संस्कार और विनम्रता मनुष्य के जीवन को महान बनाते हैं।
इसके पश्चात कथा व्यास ने बालक ध्रुव के चरित्र का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार छोटी-सी आयु में ध्रुव को अपनी सौतेली माता के कठोर वचनों से पीड़ा हुई, लेकिन उन्होंने निराश होकर गलत मार्ग नहीं अपनाया। अपनी माता के मार्गदर्शन से बालक ध्रुव ने भगवान श्रीहरि की प्राप्ति का संकल्प लिया और कठिन तपस्या कर भगवान विष्णु को प्रसन्न किया।
अनुराग कृष्ण शास्त्री ने कहा कि ध्रुव की भक्ति हमें सिखाती है कि यदि संकल्प दृढ़ हो और लक्ष्य पवित्र हो तो उम्र कभी बाधा नहीं बनती। बालक ध्रुव की अटूट श्रद्धा, तपस्या और धैर्य के कारण उन्हें भगवान का आशीर्वाद प्राप्त हुआ और वे ध्रुव पद के अधिकारी बने। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ धार्मिक संस्कार और भारतीय संस्कृति का ज्ञान देना भी अत्यंत आवश्यक है।
कथा के अगले प्रसंग में जड़ भरत चरित्र का वर्णन करते हुए शास्त्री ने बताया कि संसार में रहते हुए मनुष्य को मोह-माया और आसक्ति से स्वयं को बचाकर रखना चाहिए। उन्होंने जड़ भरत के जीवन प्रसंग के माध्यम से समझाया कि आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति के लिए आत्मज्ञान और वैराग्य का विशेष महत्व है। उन्होंने कहा कि मनुष्य संसार में अपनी जिम्मेदारियां निभाए, लेकिन सांसारिक मोह को अपने ऊपर इस प्रकार हावी न होने दे कि वह अपने वास्तविक उद्देश्य को ही भूल जाए।
इसके बाद कथा का वातावरण भक्त प्रह्लाद के प्रसंग से और अधिक भक्तिमय हो गया। जैसे ही व्यासपीठ से भगवान विष्णु के अनन्य भक्त प्रह्लाद की कथा प्रारंभ हुई, श्रद्धालु मंत्रमुग्ध होकर कथा सुनने लगे। अनुराग कृष्ण शास्त्री ने बताया कि प्रह्लाद ने विपरीत परिस्थितियों में भी भगवान की भक्ति नहीं छोड़ी। उनके पिता हिरण्यकशिपु ने अनेक प्रकार से उन्हें भगवान विष्णु की भक्ति से विमुख करने का प्रयास किया, लेकिन प्रह्लाद की श्रद्धा और विश्वास अडिग रहे।
उन्होंने कहा कि सच्ची भक्ति वही है, जो परिस्थितियों के बदलने पर भी न बदले। भक्त प्रह्लाद के जीवन से यह शिक्षा मिलती है कि भगवान पर विश्वास रखने वाले भक्त को भयभीत होने की आवश्यकता नहीं होती। भक्ति मनुष्य के भीतर साहस, धैर्य और सकारात्मक शक्ति का संचार करती है।
प्रह्लाद चरित्र के दौरान भगवान के सर्वव्यापक स्वरूप का वर्णन करते हुए शास्त्री ने कहा कि ईश्वर केवल मंदिरों में ही नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव और कण-कण में विद्यमान हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे अपने जीवन में सत्य, प्रेम, दया, करुणा, संयम और सेवा को स्थान दें। यही श्रीमद्भागवत का मूल संदेश है।
कथा के दौरान अनुराग कृष्ण शास्त्री के भावपूर्ण वाचन, मधुर भजनों और प्रसंगों की प्रभावशाली प्रस्तुति से कथा पंडाल में उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर नजर आए। बीच-बीच में भगवान के जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। बड़ी संख्या में महिलाओं, पुरुषों, युवाओं एवं बच्चों ने कथा का श्रवण कर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया, आयोजन समिति के ताराचंद्र अग्रवाल एव कन्हैया अग्रवाल ने बताया कि कथा के चतुर्थ दिवस 16 सितंबर को गजेंद्र मोक्ष, समुद्र मंथन, वामन अवतार, श्री राम चरित्र की कथा आयोजित होने के साथ भगवान श्री कृष्ण का जन्म उत्सव कथा स्थल में धूमधाम से मनाया जाएगा,
तीसरे दिवस की कथा के समापन पर श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीहरि के जयघोष के साथ कथा का आनंद लिया। आयोजन समिति द्वारा श्रद्धालुओं से आगामी दिवसों में भी अधिक से अधिक संख्या में कथा स्थल पर पहुंचकर श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करने एवं आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने का आग्रह किया गया।
सात दिवसीय इस संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ के प्रत्येक दिवस श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है। कथा के माध्यम से जहां धर्म और अध्यात्म का संदेश दिया जा रहा है, वहीं समाज में संस्कार, सदाचार, भक्ति और मानवीय मूल्यों को मजबूत करने का प्रयास भी किया जा रहा है।













