आचार्य विद्यासागर महाराज एवं आचार्य समय सागर महाराज के अवतरण दिवस पर गुरु भक्ति से सराबोर हुआ अकलतरा जैन मंदिर
आचार्य छत्तीसी विधान में 36 अर्घ समर्पित कर व्यक्त की गुरु चरणों में श्रद्धा,
मुनि श्री प्रसाद सागर महाराज ने बताया जीवन में गुरु का महत्व, आचार्य भगवन विद्यासागर महाराज के जीवन से प्रेरणा लेने का किया आह्वान
अकलतरा – नगर के जैन मंदिर में शरद पूर्णिमा के पावन अवसर पर आचार्य भगवन 108 श्री विद्यासागर महाराज एवं आचार्य श्री 108 समय सागर महाराज के अवतरण दिवस तथा निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 प्रसाद सागर महाराज के 30वें मुनि दीक्षा दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित गुरु उपकार महोत्सव के अंतर्गत धार्मिक आयोजन श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर जैन मंदिर का वातावरण गुरु भक्ति, मंगल आराधना और धार्मिक अनुष्ठानों से भक्तिमय हो उठा। श्रद्धालुओं ने भगवान की शांतिधारा कर पुण्य लाभ अर्जित किया तथा आचार्य छत्तीसी विधान में भक्ति भाव के साथ पूजा-अर्चना करते हुए 36 अर्घ समर्पित किए।
मुनि श्री 108 प्रसाद सागर महाराज एवं मुनि श्री 108 शीतल सागर महाराज के मंगल सानिध्य में संपन्न हुए इस धार्मिक आयोजन में समाज के श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। गुरुजनों के प्रति श्रद्धा और समर्पण के साथ आयोजित इस कार्यक्रम में धर्म, अध्यात्म और गुरु उपकार के महत्व को आत्मसात करने का संदेश दिया गया।
दोनों बेदियों पर श्रद्धालुओं ने किया शांतिधारा का सौभाग्य प्राप्त
धार्मिक आयोजन के दौरान जैन मंदिर की ऊपर की बेदी में शांतिधारा करने का सौभाग्य मदन जैन, नित्या जैन, मनी जैन एवं हनी जैन पंडित परिवार तथा सुरेश जैन, मनोज जैन, रानू जैन एवं राज जैन मुस्कान फैशन परिवार को प्राप्त हुआ। श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव के साथ शांतिधारा कर भगवान के चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित की तथा परिवार एवं समाज की सुख-समृद्धि और मंगलकामना की।
इसी क्रम में मंदिर की नीचे की बेदी में शांतिधारा करने का सौभाग्य मंगल चंद जैन, पवन जैन एवं निशा जैन कोक्षल परिवार तथा चंद्रगिरी तीर्थ क्षेत्र डोंगरगढ़ के ट्रस्टी एवं परम गुरु भक्त राजकुमार जैन एवं विमलेश जैन, भिलाई को प्राप्त हुआ।
दोनों बेदियों में शांतिधारा के दौरान श्रद्धालुओं ने भक्ति भाव से धार्मिक अनुष्ठान में सहभागिता निभाई। मंदिर परिसर में आध्यात्मिक वातावरण के बीच श्रद्धालुओं ने भगवान की आराधना करते हुए गुरुजनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की।
आचार्य छत्तीसी विधान में 36 अर्घ समर्पित कर की गई विशेष आराधना – 
मुनि श्री 108 प्रसाद सागर महाराज एवं मुनि श्री 108 शीतल सागर महाराज के मंगल सानिध्य में आचार्य छत्तीसी विधान का आयोजन विशेष भक्ति और श्रद्धा के साथ किया गया। विधान के दौरान श्रद्धालुओं ने विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना करते हुए 36 अर्घ समर्पित किए।
आचार्य छत्तीसी विधान के माध्यम से श्रद्धालुओं ने आचार्य भगवन के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए उनके आदर्शों, संयम, तप, त्याग और आध्यात्मिक जीवन से प्रेरणा लेने का भाव प्रकट किया। पूजा-अर्चना के दौरान वातावरण भक्तिमय बना रहा तथा श्रद्धालुओं ने धर्म आराधना में सहभागी बनकर आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प लिया।
यह आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गुरु परंपरा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनके बताए मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त करने का अवसर भी बना। श्रद्धालुओं ने गुरुजनों के जीवन और उनके उपदेशों को स्मरण करते हुए धर्म, संयम और सदाचार को अपने जीवन में अपनाने का भाव व्यक्त किया।
गुरु के बिना जीवन को सही दिशा मिलना कठिन : मुनि श्री प्रसाद सागर महाराज
धार्मिक आयोजन के दौरान निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 प्रसाद सागर महाराज ने जीवन में गुरु के महत्व पर प्रकाश डालते हुए आचार्य भगवन 108 श्री विद्यासागर महाराज के प्रेरणादायी जीवन का स्मरण कराया। उन्होंने गुरु के प्रति श्रद्धा, समर्पण और कृतज्ञता के भाव को जीवन में महत्वपूर्ण बताते हुए आचार्य भगवन के आदर्शों से प्रेरणा लेने की बात कही।
उन्होंने आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के जीवन को साधना, संयम, त्याग और आध्यात्मिक चेतना का प्रेरक उदाहरण बताते हुए उनके आदर्शों को आत्मसात करने की आवश्यकता पर बल दिया। गुरु का सानिध्य व्यक्ति को जीवन की वास्तविक दिशा समझने, आत्मचिंतन करने और अपने आचरण को बेहतर बनाने की प्रेरणा देता है। गुरु केवल धार्मिक ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि अपने जीवन और आचरण के माध्यम से सत्य, अहिंसा, संयम एवं आत्मकल्याण का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं।
मुनि श्री ने आचार्य भगवन के जीवन से प्रेरणा लेकर उनके बताए मार्ग पर चलने तथा अपने जीवन में धार्मिक संस्कारों को मजबूत बनाने का संदेश दिया। उन्होंने गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा को उनके आदर्शों को व्यवहार में उतारने से जोड़ते हुए धर्म के प्रति समर्पण और आत्मकल्याण की भावना को महत्वपूर्ण बताया।
आचार्य विद्यासागर महाराज का जीवन त्याग, तपस्या और साधना की प्रेरणा – धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री 108 शीतल सागर महाराज ने कहा कि 
आचार्य भगवन श्री विद्यासागर महाराज का जीवन जैन धर्म की आध्यात्मिक परंपरा में त्याग, तपस्या, संयम और आत्मसाधना का विशिष्ट उदाहरण माना जाता है। उनका जीवन संदेश देता है कि वास्तविक सुख बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संतोष, अनुशासन और आध्यात्मिक उन्नति में निहित है।
उनकी साधना और जीवन मूल्यों ने असंख्य श्रद्धालुओं को धर्म के प्रति जागरूक होने, अहिंसा के मार्ग पर चलने तथा मानवीय संवेदनाओं को महत्व देने की प्रेरणा दी।
आचार्य श्री 108 समय सागर महाराज के अवतरण दिवस के अवसर पर भी श्रद्धालुओं ने मंगल भाव के साथ अपनी श्रद्धा समर्पित की। वहीं मुनि श्री 108 प्रसाद सागर महाराज के 30वें मुनि दीक्षा दिवस ने इस आयोजन को विशेष आध्यात्मिक महत्व प्रदान किया। यह अवसर साधना, संयम और गुरु उपकार के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का माध्यम बना।
गुरु उपकार महोत्सव ने दिया धर्म, संस्कार और आत्मकल्याण का संदेश
जैन धर्म में गुरु का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। गुरु अपने ज्ञान, तप, त्याग और साधना के माध्यम से साधक को आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा का अर्थ केवल उनकी पूजा-अर्चना करना ही नहीं, बल्कि उनके उपदेशों को जीवन में अपनाना और अपने आचरण को धर्मानुकूल बनाना भी है।
अकलतरा जैन मंदिर में आयोजित इस धार्मिक कार्यक्रम ने श्रद्धालुओं को गुरु परंपरा के महत्व को समझने तथा आचार्य भगवन के आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का अवसर प्रदान किया। शांतिधारा, आचार्य छत्तीसी विधान और 36 अर्घ समर्पण के माध्यम से श्रद्धालुओं ने अपनी भक्ति व्यक्त की, वहीं मुनि श्री प्रसाद सागर महाराज के मंगल संदेश ने गुरु भक्ति को जीवन मूल्यों से जोड़ने की प्रेरणा दी।
शरद पूर्णिमा के पावन अवसर पर आयोजित यह धार्मिक आयोजन गुरुजनों के प्रति श्रद्धा, समर्पण और कृतज्ञता का प्रतीक बना। मंदिर परिसर में भक्ति और आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वातावरण के बीच श्रद्धालुओं ने धर्म आराधना कर पुण्य लाभ अर्जित किया तथा गुरुजनों के बताए मार्ग पर चलने की भावना के साथ आयोजन में सहभागिता निभाई, कार्यक्रम में जैन समाज के लोग बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
