दीपावली पर मिट्टी के दीये अपनाने और स्थानीय बाजार को बढ़ावा देने वेल विशर फाउंडेशन ने चलाया जागरूकता अभियान
मिट्टी के दीये जलाकर रोशन करें कुम्हारों के घर, स्थानीय बाजार से खरीदारी कर बढ़ाएं छोटे व्यापारियों का सम्मान शासकीय प्राथमिक शाला कोटगढ़ में आयोजित हुई भाषण एवं मिट्टी के दीये बनाने की प्रतियोगिता
पांच वर्षों से लगातार जनजागरूकता अभियान चलाकर भारतीय संस्कृति, पारंपरिक कला और स्थानीय कारीगरों को प्रोत्साहित कर रही संस्था
अकलतरा – दीपावली केवल दीप जलाने, घरों को सजाने और खुशियां मनाने का त्योहार नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, परंपरा, आत्मनिर्भरता और आपसी सहयोग की भावना को साकार करने का भी पावन अवसर है। दीपावली के अवसर पर जहां बाजारों में आकर्षक सजावटी सामानों और आधुनिक रोशनी के विभिन्न साधनों की मांग बढ़ती जा रही है, वहीं पारंपरिक मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हारों तथा स्थानीय छोटे व्यापारियों के सामने अपनी आजीविका को बनाए रखने की चुनौती भी बनी रहती है। ऐसे में भारतीय परंपराओं को संरक्षित करने और स्थानीय कारीगरों के श्रम को सम्मान दिलाने की दिशा में वेल विशर फाउंडेशन ने सराहनीय पहल की है।
दीपावली के पावन पर्व पर मिट्टी के दीयों के अधिकाधिक उपयोग तथा स्थानीय बाजार को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से वेल विशर फाउंडेशन द्वारा शासकीय प्राथमिक शाला कोटगढ़ में जागरूकता अभियान आयोजित किया गया। इस अभियान के माध्यम से बच्चों को भारतीय संस्कृति, पारंपरिक कला, स्वदेशी उत्पादों के महत्व तथा स्थानीय कारीगरों और छोटे व्यापारियों के आर्थिक योगदान के प्रति जागरूक किया गया। कार्यक्रम के अंतर्गत बच्चों के लिए भाषण प्रतियोगिता एवं मिट्टी के दीये बनाने की प्रतियोगिता आयोजित की गई। इन गतिविधियों के माध्यम से विद्यार्थियों को न केवल अपनी रचनात्मक प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर मिला, बल्कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझने और उसके संरक्षण में सहभागी बनने की प्रेरणा भी मिली।
मिट्टी के दीये केवल परंपरा नहीं, बल्कि कुम्हारों की आजीविका का आधार – 
भारतीय संस्कृति में मिट्टी के दीयों का विशेष महत्व है। दीपावली के अवसर पर मिट्टी के दीये जलाना अंधकार पर प्रकाश, निराशा पर आशा और नकारात्मकता पर सकारात्मकता की विजय का प्रतीक माना जाता है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी हमारी सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा है। मिट्टी से दीये तैयार करने वाले कुम्हार अपनी मेहनत, कौशल और पारंपरिक कला के माध्यम से दीपावली की खुशियों को रोशन करते हैं।
हालांकि, बदलते समय के साथ बाजार में बिजली से चलने वाली सजावटी लाइटों और विभिन्न प्रकार के आधुनिक उत्पादों का प्रचलन बढ़ा है। इसके कारण कई बार पारंपरिक मिट्टी के दीयों की मांग प्रभावित होती है। ऐसे में यदि प्रत्येक परिवार दीपावली पर अपनी खरीदारी में मिट्टी के दीयों को प्राथमिकता दे, तो यह कदम स्थानीय कुम्हारों के लिए आर्थिक सहयोग का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।
वेल विशर फाउंडेशन का जागरूकता अभियान इसी भावना को समाज तक पहुंचाने का प्रयास है। संस्था ने बच्चों के माध्यम से परिवारों और समाज में यह संदेश प्रसारित करने की पहल की कि त्योहारों की खुशियां तभी सार्थक होंगी, जब उनका लाभ उन लोगों तक भी पहुंचेगा, जो अपनी मेहनत और हुनर से इन त्योहारों को खास बनाते हैं।
भाषण प्रतियोगिता के माध्यम से बच्चों को दिया स्वदेशी अपनाने का संदेश –
शासकीय प्राथमिक शाला कोटगढ़ में आयोजित भाषण प्रतियोगिता के माध्यम से विद्यार्थियों को मिट्टी के दीयों के महत्व, भारतीय संस्कृति में उनके स्थान और स्थानीय बाजार से खरीदारी करने के लाभों पर अपने विचार व्यक्त करने का अवसर प्रदान किया गया। इस तरह की प्रतियोगिताएं बच्चों में आत्मविश्वास, अभिव्यक्ति कौशल और सामाजिक विषयों के प्रति जागरूकता विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
बच्चों को यह समझाने का प्रयास किया गया कि स्थानीय बाजार से सामान खरीदना केवल खरीदारी का एक विकल्प नहीं, बल्कि अपने आसपास के छोटे व्यापारियों, कारीगरों और मेहनतकश परिवारों को सहयोग देने का माध्यम भी है। जब लोग स्थानीय उत्पादों को अपनाते हैं, तो स्थानीय स्तर पर होने वाली आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है और छोटे व्यवसायों को आगे बढ़ने का अवसर प्राप्त होता है।
संस्था की इस पहल का उद्देश्य विद्यार्थियों को बचपन से ही जिम्मेदार नागरिक बनने की प्रेरणा देना है, ताकि वे भविष्य में भी भारतीय संस्कृति, स्थानीय उत्पादों और पारंपरिक व्यवसायों के संरक्षण के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रख सकें।
मिट्टी के दीये बनाने की प्रतियोगिता ने बढ़ाया पारंपरिक कला के प्रति आकर्षण –
जागरूकता अभियान के अंतर्गत मिट्टी के दीये बनाने की प्रतियोगिता भी आयोजित की गई। इस गतिविधि के माध्यम से बच्चों को मिट्टी से जुड़ी पारंपरिक कला को समझने तथा अपनी रचनात्मक क्षमता का उपयोग करने का अवसर मिला।
मिट्टी के दीये बनाना केवल एक कलात्मक गतिविधि नहीं है, बल्कि यह उस पारंपरिक कौशल का परिचय भी है, जिसे कुम्हार पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाते आए हैं। मिट्टी को आकार देकर उपयोगी और सुंदर वस्तु तैयार करने की प्रक्रिया में श्रम, धैर्य, कल्पनाशीलता और कला का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।
बच्चों को इस कला से परिचित कराना इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि आधुनिक जीवनशैली के बीच पारंपरिक हस्तकला और स्थानीय शिल्प के प्रति नई पीढ़ी का जुड़ाव बनाए रखना आवश्यक है। ऐसे आयोजन विद्यार्थियों को अपनी जड़ों से जोड़ने के साथ-साथ मेहनत से तैयार होने वाले उत्पादों के वास्तविक मूल्य को समझने की प्रेरणा देते हैं।
पांच वर्षों से लगातार जागरूकता अभियान चला रही संस्था –
वेल विशर फाउंडेशन के सचिव चिराग शर्मा ने अभियान के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संस्था पिछले पांच वर्षों से लगातार जागरूकता अभियानों के माध्यम से लोगों को दीपावली पर अधिक से अधिक मिट्टी के दीयों का उपयोग करने और स्थानीय बाजार से खरीदारी करने के लिए प्रेरित कर रही है।
उन्होंने कहा कि दीपावली जैसे प्रमुख त्योहार पर मिट्टी के दीये खरीदने से कुम्हार भाइयों की मेहनत को सम्मान मिलता है और उनकी आजीविका को सहयोग प्राप्त होता है। पारंपरिक रूप से दीये बनाने वाले कारीगर पूरे वर्ष इस अवसर की तैयारी करते हैं। ऐसे में उनके बनाए उत्पादों को खरीदना उनके श्रम का सम्मान करने और उनकी कला को जीवित रखने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है।
उन्होंने यह भी कहा कि ऑनलाइन खरीदारी के बढ़ते चलन के बीच स्थानीय दुकानदारों और छोटे व्यापारियों को प्रोत्साहित करना समय की आवश्यकता है। यदि लोग अपनी जरूरत का सामान अपने आसपास के बाजार से खरीदने की आदत विकसित करें, तो स्थानीय व्यापार को मजबूती मिलेगी। संस्था का प्रयास है कि समाज में ऐसी सोच विकसित हो, जिसमें त्योहारों की खरीदारी के साथ सामाजिक जिम्मेदारी का भाव भी जुड़ा हो।
त्योहार की खुशियां छोटे व्यापारियों और कुम्हारों तक भी पहुंचें : सतीश मानिकपुरी
संस्था के सदस्य सतीश मानिकपुरी ने कहा कि त्योहारों का वास्तविक अर्थ केवल स्वयं खुशियां मनाना नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में भी खुशियां बांटना है। दीपावली के अवसर पर जब हर घर रोशनी से जगमगाता है, तब हमें उन परिवारों के बारे में भी विचार करना चाहिए, जो अपनी मेहनत से हमारे त्योहार को विशेष बनाते हैं।
उन्होंने कहा कि संस्था का प्रयास है कि दीपावली की खुशियां छोटे व्यापारियों और कुम्हार भाइयों तक भी पहुंचे, ताकि वे भी अपने परिवार के साथ उत्साहपूर्वक त्योहार मना सकें। स्थानीय बाजार से खरीदारी करने और मिट्टी के दीयों को अपनाने जैसी छोटी-छोटी पहल समाज में बड़ा सकारात्मक बदलाव ला सकती हैं।
उन्होंने लोगों से अपील की कि वे त्योहारों के दौरान खरीदारी करते समय स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता दें और पारंपरिक कारीगरों के हुनर को प्रोत्साहित करें। इससे न केवल स्थानीय व्यापार को सहयोग मिलेगा, बल्कि भारतीय परंपराओं को भी नई पीढ़ी तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।
संस्था के सदस्यों ने स्थानीय उत्पादों को अपनाने पर दिया जोर –
कार्यक्रम के दौरान वेल विशर फाउंडेशन के सदस्य फिरोज कश्यप, मन्नू थवाईत, त्रिलोकी नारायण पटेल एवं रूपेश कंवर ने भी अभियान के उद्देश्य पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने स्थानीय उत्पादों को अपनाने, पारंपरिक कला को प्रोत्साहित करने और समाज में जागरूक उपभोक्ता व्यवहार विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
सदस्यों ने इस बात को रेखांकित किया कि किसी भी क्षेत्र की आर्थिक मजबूती में स्थानीय व्यापारियों, छोटे दुकानदारों और पारंपरिक कारीगरों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि त्योहारों के अवसर पर लोग स्थानीय बाजार से खरीदारी करने को प्राथमिकता दें, तो इससे छोटे व्यवसायों को प्रोत्साहन मिल सकता है।
उन्होंने कहा कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति की छोटी-सी पहल भी किसी जरूरतमंद परिवार के लिए बड़ी सहायता साबित हो सकती है। मिट्टी के दीये खरीदना, स्थानीय दुकानों से सामान लेना और पारंपरिक हस्तकला को प्रोत्साहित करना ऐसे ही सरल प्रयास हैं, जिनसे सामाजिक सहयोग और आर्थिक सहभागिता की भावना को मजबूत किया जा सकता है।
शिक्षकों ने की वेल विशर फाउंडेशन की पहल की सराहना –
शासकीय प्राथमिक शाला कोटगढ़ की शिक्षिका श्रीमती शबीना बानो खान ने वेल विशर फाउंडेशन द्वारा आयोजित जागरूकता अभियान की सराहना की। उन्होंने कहा कि मिट्टी के दीयों का उपयोग हमारी संस्कृति और परंपरा से गहराई से जुड़ा हुआ है। बच्चों को कम उम्र से ही अपनी सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक कलाओं और स्थानीय कारीगरों के महत्व से परिचित कराना आवश्यक है।
उन्होंने इस पहल को समाज में सकारात्मक संदेश प्रसारित करने वाला प्रयास बताते हुए आश्वस्त किया कि वे भी सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को मिट्टी के दीये अपनाने तथा स्थानीय बाजार से खरीदारी करने के लिए जागरूक करेंगी।
विद्यालय में आयोजित इस कार्यक्रम ने शिक्षा के साथ सामाजिक जागरूकता को जोड़ने का संदेश दिया। ऐसे आयोजन विद्यार्थियों को पाठ्यपुस्तकों से आगे बढ़कर समाज की वास्तविक परिस्थितियों को समझने और अपने आसपास सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रेरित करते हैं।
कार्यक्रम में शाला की प्रधान पाठक श्रीमती सिद्धि सिदार, सहायक शिक्षक श्रीमती शबीना बानो खान, श्रीमती हेमलता यादव, श्रीमती शशि कंवर, श्रीमती मीना बंजारे एवं श्री डमरूधर उपस्थित रहे।
स्थानीय बाजार से खरीदारी बने सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा-
वर्तमान समय में ऑनलाइन खरीदारी की सुविधा ने लोगों के लिए वस्तुएं खरीदना आसान बनाया है, लेकिन इसके साथ ही स्थानीय दुकानदारों और छोटे व्यापारियों को भी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। ऐसे में त्योहारों के दौरान स्थानीय बाजार को प्राथमिकता देना छोटे व्यापारियों के लिए सहयोग का एक सार्थक माध्यम बन सकता है।
स्थानीय दुकानों से खरीदारी करने पर उपभोक्ताओं को अपने आसपास उपलब्ध उत्पादों और कारीगरों के काम को जानने का अवसर भी मिलता है। विशेष रूप से दीपावली जैसे त्योहार पर मिट्टी के दीये, पारंपरिक सजावटी सामान और स्थानीय हस्तशिल्प खरीदकर लोग अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने में योगदान दे सकते हैं।
वेल विशर फाउंडेशन का अभियान इसी सोच को मजबूत करने की दिशा में एक प्रयास है। संस्था चाहती है कि स्थानीय बाजार से खरीदारी केवल एक मौसमी गतिविधि बनकर न रह जाए, बल्कि यह लोगों की नियमित आदत का हिस्सा बने। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और व्यापार को प्रोत्साहन देने की संभावनाएं भी मजबूत होंगी।
वेल विशर फाउंडेशन की आम नागरिकों से अपील-
वेल विशर फाउंडेशन ने दीपावली के पावन अवसर पर आम नागरिकों से अपील की है कि वे अधिक से अधिक मिट्टी के दीये जलाकर भारतीय संस्कृति और परंपराओं को प्रोत्साहित करें। साथ ही, खरीदारी करते समय स्थानीय बाजार को प्राथमिकता दें तथा अपने आसपास के कुम्हारों, छोटे दुकानदारों और स्थानीय कारीगरों से सामान खरीदकर उन्हें आर्थिक सहयोग प्रदान करें।
संस्था ने लोगों से आग्रह किया कि वे अपने परिवार के बच्चों को भी मिट्टी के दीयों के महत्व, पारंपरिक कला और स्थानीय उत्पादों की उपयोगिता के बारे में बताएं। इसके साथ ही सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से जागरूकता संदेश प्रसारित कर अधिक से अधिक लोगों को इस अभियान से जोड़ें।
दीपावली का प्रकाश तभी व्यापक अर्थों में सार्थक होगा, जब उसकी रोशनी समाज के हर वर्ग तक पहुंचे। यदि प्रत्येक परिवार कुछ मिट्टी के दीये खरीदने और स्थानीय बाजार से जरूरत का सामान लेने का संकल्प ले, तो यह कदम अनेक कुम्हारों और छोटे व्यापारियों के जीवन में आशा की नई किरण जगा सकता है।
वेल विशर फाउंडेशन का संदेश स्पष्ट है—इस दीपावली केवल अपने घर को ही नहीं, बल्कि किसी मेहनतकश परिवार के जीवन को भी रोशन करें।
