उत्तम शौच धर्म के संदेश से गुंजायमान हुआ जैन मंदिर
श्री 1008 पुष्पदंत भगवान का मोक्ष कल्याणक महोत्सव श्रद्धा एवं भक्ति भाव से मनाया गया 
अकलतरा – दस लक्षण महापर्व के चतुर्थ दिवस जैन मंदिर अकलतरा में उत्तम शौच धर्म एवं श्री 1008 पुष्पदंत भगवान के मोक्ष कल्याणक महोत्सव का आयोजन श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ किया गया। निर्यापक श्रवण मुनि श्री 108 प्रसाद सागर महाराज एवं मुनि श्री 108 शीतल सागर महाराज के मंगल सानिध्य में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम में जैन समाज के श्रद्धालुओं ने बड़ी संख्या में शामिल होकर भगवान की आराधना की और धर्मलाभ लिया।
कार्यक्रम के दौरान श्रवण संस्कृति संस्थान, सांगानेर, जयपुर से पधारीं स्नातक अणिमा जैन एवं विदुषी अक्षरा जैन ने मधुर संगीत की धुन पर श्रद्धालुओं को विधिवत पूजा-अर्चना कराई। भक्ति गीतों एवं धार्मिक वातावरण के बीच श्रद्धालु पूरी श्रद्धा के साथ भगवान की आराधना में लीन दिखाई दिए। श्री 1008 पुष्पदंत भगवान के मोक्ष कल्याणक के अवसर पर समाज के श्रद्धालुओं द्वारा भक्तिभावपूर्वक निर्वाण लाडू अर्पित किया गया। इस दौरान मंदिर परिसर भगवान के जयकारों और भक्ति भाव से गुंजायमान रहा।
धार्मिक आयोजन के क्रम में समाज के लोगों द्वारा तत्वार्थ सूत्र का सामूहिक वाचन भी किया गया। श्रद्धालुओं ने जैन दर्शन के मूल सिद्धांतों का स्मरण करते हुए आत्मशुद्धि, संयम और धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
विभिन्न परिवारों को मिला शांति धारा का सौभाग्य
उत्तम शौच धर्म के पावन अवसर पर भगवान की प्रतिमाओं पर शांति धारा का आयोजन भी किया गया। श्री 1008 मुनि सुब्रतनाथ भगवान की प्रतिमा पर शांति धारा करने का सौभाग्य इंद्र कुमार जैन, सुहानी जैन, अयन जैन एवं शशांक जैन पंडित परिवार को प्राप्त हुआ।
इसी क्रम में श्री 1008 पारसनाथ भगवान की प्रतिमा पर शांति धारा करने का सौभाग्य अरविंद जैन एवं सुषमा जैन, सिंचाई कॉलोनी अकलतरा तथा सतीश जैन एवं सिद्धू जैन चौधरी परिवार को प्राप्त हुआ।
वहीं श्री 1008 शांतिनाथ भगवान की प्रतिमा पर शांति धारा का सौभाग्य मंगलचंद जैन, पवन कुमार जैन, मनोज जैन एवं राज जैन सिंघई परिवार को प्राप्त हुआ। श्रद्धालुओं ने विधि-विधान एवं भक्तिभाव के साथ शांति धारा कर भगवान का अभिषेक किया।
उत्तम शौच धर्म आत्मा की निर्मलता का मार्ग –
धर्मसभा को संबोधित करते हुए निर्यापक श्रवण मुनि श्री 108 प्रसाद सागर महाराज ने उत्तम शौच धर्म के आध्यात्मिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि शौच का वास्तविक अर्थ केवल बाहरी स्वच्छता नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म की निर्मलता तथा लोभ जैसे आंतरिक विकारों से स्वयं को मुक्त करना है। जब मनुष्य के भीतर संतोष और आत्मशुद्धि का भाव जागृत होता है, तब वह बाहरी आकर्षणों और संग्रह की प्रवृत्ति से ऊपर उठकर आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर होता है।
मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य के जीवन में अनेक प्रकार की इच्छाएं जन्म लेती हैं और इच्छाओं के पीछे भागते हुए व्यक्ति अशांति का अनुभव करता है। जैन दर्शन आत्मा की शुद्धता, संतोष, संयम और अपरिग्रह के माध्यम से इन विकारों पर विजय प्राप्त करने का मार्ग बताता है। उत्तम शौच धर्म मनुष्य को लोभ और परिग्रह से दूर कर आत्मिक संतोष की ओर ले जाने वाला महत्वपूर्ण धर्म है।
पुष्पदंत भगवान के मोक्ष कल्याणक पर जीवन का स्मरण –
मुनि श्री 108 शीतल सागर महराज द्वारा श्री 1008 पुष्पदंत भगवान के मोक्ष कल्याणक के अवसर पर उनके जीवन एवं आध्यात्मिक साधना पर भी प्रकाश डाला गया। श्रद्धालुओं को बताया गया कि जैन धर्म में तीर्थंकरों और महापुरुषों के जीवन का स्मरण केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि उनके द्वारा बताए गए संयम, तप, त्याग और आत्मकल्याण के मार्ग को अपने जीवन में उतारने की प्रेरणा है।
पुष्पदंत भगवान के मोक्ष कल्याणक के अवसर पर निर्वाण लाडू अर्पित करते हुए श्रद्धालुओं ने उनके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की तथा आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प लिया।
पूरे आयोजन के दौरान जैन मंदिर में आध्यात्मिक एवं भक्तिमय वातावरण बना रहा। पूजा-अर्चना, शांति धारा, तत्वार्थ सूत्र वाचन, निर्वाण लाडू अर्पण एवं मुनि संघ के मंगल प्रवचन से दस लक्षण महापर्व का चतुर्थ दिवस श्रद्धा और धर्मभाव से परिपूर्ण रहा। जैन समाज के श्रद्धालुओं ने बड़ी संख्या में उपस्थित होकर आयोजन का धर्मलाभ लिया, कार्यक्रम में जैन समाज के लोग बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।













