दस लक्षण महापर्व के तृतीय दिवस मनाया गया उत्तम आर्जव धर्म
उत्तम आर्जव धर्म का संदेश—मन, वचन और कर्म में सरलता ही सच्चे धर्म का आधार
अकलतरा – जैन समाज द्वारा जैन मंदिर में आयोजित दस लक्षण महापर्व के अंतर्गत तृतीय दिवस उत्तम आर्जव धर्म के रूप में श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया गया, कार्यक्रम निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 प्रसाद सागर महाराज एवं मुनि श्री 108 शीतल सागर महाराज के मंगल सानिध्य में श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना एवं धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता की, प्रातःकाल से ही जैन मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही और भक्तिमय वातावरण बना रहा।
दस लक्षण महापर्व के तृतीय दिवस की धार्मिक क्रियाओं में विभिन्न परिवारों को भगवान की प्रतिमाओं पर शांतिधारा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। श्री 1008 नेमीनाथ भगवान की प्रतिमा पर शांतिधारा का सौभाग्य मंगल चंद जैन, पवन कुमार जैन, डॉ. जे. के. जैन एवं ऋषभ विद्योदय महाविद्यालय परिवार के अंकित जैन को प्राप्त हुआ।
इसी क्रम में श्री 1008 आदिनाथ भगवान की प्रतिमा पर शांतिधारा करने का सौभाग्य मदन जैन, मनी जैन, हनी जैन पंडित परिवार एवं राकेश जैन इंजीनियर तथा हर्ष जैन चौधरी परिवार को प्राप्त हुआ। वहीं श्री 1008 पारसनाथ भगवान की प्रतिमा पर शांतिधारा करने का सौभाग्य शैलेश जैन एडवोकेट, अमिताभ जैन चौधरी परिवार एवं राहुल जैन, विधान जैन चंदेरिया परिवार को प्राप्त हुआ। शांतिधारा के दौरान श्रद्धालुओं ने भगवान की आराधना करते हुए सुख, शांति एवं आत्मकल्याण की मंगल कामना की, श्रवण संस्कृति संस्थान सांगानेर जयपुर से आई हुई स्नातक अणिमा जैन एवं विदुषी अक्षरा जैन द्वारा संगीत की धुन पर पूजा अर्चना करवाई गई। 
तत्वार्थ सूत्र का हुआ वाचन –
धार्मिक कार्यक्रम के दौरान पूनम जैन, आकांक्षा जैन, रोशनी जैन एवं पारस जैन द्वारा तत्वार्थ सूत्र का वाचन किया गया। श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव के साथ तत्वार्थ सूत्र का श्रवण किया। मंदिर परिसर में धार्मिक मंत्रोच्चार एवं पूजा-अर्चना से वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण हो गया।
मुनिश्री ने बताया उत्तम आर्जव धर्म का महत्व –
इस अवसर पर निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 प्रसाद सागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए उत्तम आर्जव धर्म के स्वरूप एवं महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला, मुनिश्री ने बताया कि आर्जव का अर्थ है सरलता, निष्कपटता और मन, वचन तथा कर्म में एकरूपता। व्यक्ति के भीतर किसी प्रकार का छल-कपट, बनावट या दिखावा नहीं होना चाहिए। जैसा मन में हो, वैसा ही वचन में और वैसा ही आचरण में दिखाई दे—यही आर्जव धर्म की मूल भावना है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य के जीवन में अनेक प्रकार की जटिलताएं उसके अपने व्यवहार से उत्पन्न होती हैं। जब मनुष्य किसी बात को मन में कुछ और रखता है, वाणी से कुछ और कहता है और व्यवहार में कुछ और करता है, तब जीवन में छल, कपट और असंतोष का जन्म होता है। इसके विपरीत सरल और निष्कपट व्यक्ति के जीवन में विश्वास एवं आत्मिक शांति बनी रहती है। 
मुनिश्री 108 शीतल सागर महाराज ने कहा कि उत्तम आर्जव केवल बाहरी व्यवहार की सरलता नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धता से जुड़ा धर्म है। मन में किसी के प्रति कपट न रखना, अपनी बात को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत न करना और स्वार्थ की पूर्ति के लिए छल का सहारा न लेना आर्जव धर्म की साधना है। जब मनुष्य अपने भीतर की कुटिलता को दूर करता है, तब आत्मा की ओर उसका मार्ग प्रशस्त होता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि हमें अपने जीवन में यह विचार करना चाहिए कि हमारी कथनी और करनी में कितना अंतर है। यदि मन, वचन और कर्म में एकरूपता स्थापित हो जाए तो व्यक्ति का जीवन सहज, सरल और शांतिमय बन सकता है। उत्तम आर्जव धर्म हमें स्वयं के भीतर झांकने और अपनी कमियों को पहचानकर उन्हें दूर करने की प्रेरणा देता है।
धर्मसभा में गूंजा भक्तिमय वातावरण –
मुनिश्री के प्रवचन के दौरान श्रद्धालुओं ने अत्यंत श्रद्धा और एकाग्रता के साथ धर्मोपदेश का श्रवण किया। भगवान की शांतिधारा, पूजन-अर्चन, तत्वार्थ सूत्र के वाचन एवं मुनिश्री के मंगल प्रवचन से मंदिर परिसर का वातावरण पूरी तरह धर्ममय बना रहा।
दस लक्षण महापर्व के तृतीय दिवस श्रद्धालुओं ने उत्तम आर्जव धर्म के माध्यम से सरलता, सत्यनिष्ठा, निष्कपटता और आत्मशुद्धि का संदेश प्राप्त किया। कार्यक्रम ने यह प्रेरणा दी कि धार्मिक पर्व केवल पूजा-अनुष्ठान तक सीमित न रहें, बल्कि उनके सिद्धांतों को दैनिक जीवन में उतारकर अपने आचरण को निर्मल एवं सहज बनाया जाए।
इस अवसर पर जैन समाज के श्रद्धालुओं ने भगवान की आराधना कर धर्मलाभ लिया तथा मुनिश्री के मंगल सानिध्य में आत्मकल्याण एवं आध्यात्मिक उन्नति की भावना के साथ दस लक्षण महापर्व को श्रद्धा एवं भक्ति के साथ मनाया, कार्यक्रम में जैन समाज के लोग बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।












