कलेक्टर के निर्देश भी बेअसर! दीपावली पर कुम्हारों की सुध लेना भूला नगर पालिका प्रशासन
शास्त्री चौक में खुले आसमान के नीचे धूप और असुविधाओं के बीच मिट्टी के दीये बेचने को मजबूर कुम्हार
टेंट, बैठने और पेयजल तक की व्यवस्था नहीं, बीच सड़क पर कारोबार करने से दुर्घटना का खतरा; स्थानीय कारीगरों को प्रोत्साहित करने के सरकारी दावों की खुली पोल
अकलतरा। दीपावली का पर्व प्रकाश, खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक है। इस पर्व पर मिट्टी के दीयों का विशेष धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व होता है। सदियों से कुम्हार समाज अपनी पारंपरिक कला और मेहनत से मिट्टी के दीये बनाकर दीपावली की खुशियों को रोशन करता आ रहा है। वहीं शासन-प्रशासन द्वारा भी स्थानीय कुम्हारों एवं ग्रामीण शिल्पकारों को प्रोत्साहित करने, उनके पारंपरिक व्यवसाय को संरक्षण देने और उन्हें बेहतर बाजार उपलब्ध कराने के लिए लगातार निर्देश जारी किए जाते हैं। लेकिन अकलतरा नगर में इन निर्देशों की जमीनी हकीकत कुछ और ही तस्वीर पेश कर रही है। जिला कलेक्टर द्वारा 5 नवंबर को स्थानीय कुम्हारों एवं ग्रामीण शिल्पकारों को मिट्टी के दीये बेचने के लिए बाजारों एवं सार्वजनिक स्थलों पर उपयुक्त स्थान और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने के निर्देश दिए जाने के बावजूद नगर पालिका परिषद द्वारा कोई ठोस व्यवस्था नहीं किए जाने से कुम्हार खुले आसमान के नीचे धूप और असुविधाओं के बीच अपना सामान बेचने को मजबूर हैं।
दीपावली पर्व के अवसर पर नगर के शास्त्री चौक में ग्राम बरगवां, खटोला सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में कुम्हार अपने परिवारों के साथ मिट्टी के दीये विक्रय करने पहुंचे हैं। इन कुम्हारों ने कई दिनों की मेहनत से मिट्टी के दीये तैयार किए हैं और दीपावली के अवसर पर उनकी बिक्री कर अपने परिवार की आजीविका चलाने की उम्मीद लेकर नगर पहुंचे हैं। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि जहां एक ओर स्थानीय कारीगरों को प्रोत्साहित करने की बातें की जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर उनके लिए बुनियादी सुविधाओं तक की व्यवस्था नहीं की गई है।
कलेक्टर के आदेश के बाद भी नहीं हुई व्यवस्था –
उल्लेखनीय है कि जिला कलेक्टर द्वारा 5 नवंबर को जारी निर्देश में स्थानीय कुम्हारों एवं ग्रामीण शिल्पकारों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से मिट्टी के दीयों के विक्रय के लिए बाजारों एवं सार्वजनिक स्थलों पर उपयुक्त स्थान उपलब्ध कराने तथा आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए थे। इस पहल का उद्देश्य पारंपरिक मिट्टी के दीयों के उपयोग को बढ़ावा देना, स्थानीय कारीगरों को आर्थिक रूप से सहयोग प्रदान करना और उनके उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराना था।
लेकिन अकलतरा नगर के शास्त्री चौक में कलेक्टर के निर्देशों का कितना पालन हुआ, इसकी तस्वीर स्वयं वहां बैठकर दीये बेच रहे कुम्हारों की स्थिति बयां कर रही है। नगर पालिका परिषद द्वारा न तो धूप से बचाव के लिए टेंट अथवा छाया की व्यवस्था की गई और न ही उनके बैठने के लिए कोई समुचित इंतजाम किया गया। पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधा भी उपलब्ध नहीं कराई गई। इसके चलते ग्रामीण क्षेत्रों से आए कुम्हारों को जमीन पर बैठकर खुले आसमान के नीचे अपने मिट्टी के दीये बेचने पड़ रहे हैं।
धूप और असुविधाओं के बीच मेहनत की कमाई का इंतजार –
ग्राम बरगवां, खटोला और आसपास के गांवों से आने वाले कुम्हारों के लिए दीपावली का बाजार वर्षभर की मेहनत से तैयार किए गए उत्पादों को बेचने का महत्वपूर्ण अवसर होता है। मिट्टी लाने से लेकर उसे तैयार करने, दीये बनाने, सुखाने और पकाने तक में काफी मेहनत और समय लगता है। इसके बाद उम्मीद रहती है कि दीपावली के अवसर पर अच्छी बिक्री होगी और परिवार की आर्थिक जरूरतें पूरी हो सकेंगी।
लेकिन जब इन्हीं कारीगरों को अपने उत्पाद बेचने के लिए उचित स्थान, छाया, बैठने और पेयजल जैसी सुविधाएं तक नहीं मिलतीं, तो उनकी परेशानियां और बढ़ जाती हैं। खुले आसमान के नीचे जमीन पर बैठकर घंटों ग्राहकों का इंतजार करना उनकी मजबूरी बन गया है। सवाल यह है कि जब शासन द्वारा इन पारंपरिक कारीगरों को प्रोत्साहित करने के स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं, तो स्थानीय स्तर पर उनका पालन कराने की जिम्मेदारी किसकी है?
बीच सड़क पर दीयों की बिक्री, दुर्घटना की आशंका –
शास्त्री चौक में मिट्टी के दीयों का विक्रय जिस स्थान पर किया जा रहा है, वहां सड़क पर लगातार वाहनों और राहगीरों का आवागमन बना रहता है। पर्याप्त एवं सुरक्षित स्थान उपलब्ध नहीं होने के कारण सड़क के किनारे और आवागमन प्रभावित होने वाली जगह पर बैठकर दीये बेचने की स्थिति निर्मित हो रही है। इससे एक ओर कुम्हारों की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर सड़क से गुजरने वाले वाहन चालकों और आम नागरिकों को भी असुविधा हो सकती है।
दीपावली के दौरान बाजारों में सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक भीड़ रहती है। ऐसे में यदि मिट्टी के दीये बेचने वाले कुम्हारों के लिए सुरक्षित एवं व्यवस्थित स्थान निर्धारित नहीं किया जाता, तो किसी अप्रिय दुर्घटना की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। प्रशासन को चाहिए कि कुम्हारों के लिए सड़क से हटकर ऐसा उपयुक्त स्थान निर्धारित करे, जहां वे बिना किसी परेशानी और सुरक्षा संबंधी खतरे के अपने उत्पादों का विक्रय कर सकें।
स्थानीय कारीगरों को प्रोत्साहन देने के दावे और जमीनी हकीकत में अंतर –
राज्य शासन और जिला प्रशासन द्वारा समय-समय पर स्थानीय उत्पादों, पारंपरिक व्यवसायों और ग्रामीण शिल्पकारों को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाओं एवं निर्देशों के माध्यम से पहल की जाती है। मिट्टी के दीयों का उपयोग बढ़ाना केवल एक व्यवसाय को प्रोत्साहित करना नहीं, बल्कि हमारी पारंपरिक संस्कृति, पर्यावरण और स्थानीय अर्थव्यवस्था को संरक्षण देना भी है।
इसके बावजूद अकलतरा में स्थानीय कुम्हारों के लिए कोई समुचित व्यवस्था नहीं होना नगर पालिका परिषद की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। यदि प्रशासनिक निर्देशों के बाद भी संबंधित निकाय द्वारा आवश्यक व्यवस्थाएं नहीं की जातीं, तो ऐसे निर्देशों का वास्तविक लाभ जरूरतमंद लोगों तक कैसे पहुंचेगा? सरकारी योजनाओं और आदेशों की सफलता केवल कागजों तक सीमित रहने से नहीं, बल्कि उनके धरातल पर प्रभावी क्रियान्वयन से सुनिश्चित होती है।
जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संस्थाओं की उदासीनता पर भी सवाल –
इस पूरे मामले में नगर के जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। दीपावली जैसे महत्वपूर्ण पर्व पर ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले कुम्हारों को थोड़ी सी सहायता और सहयोग देकर उनके व्यवसाय को प्रोत्साहित किया जा सकता था। टेंट लगवाना, बैठने की व्यवस्था करना, पीने के पानी की सुविधा उपलब्ध कराना और सुरक्षित स्थान पर दुकानें लगवाने में सहयोग करना कोई बड़ी पहल नहीं थी।
नगर के जनप्रतिनिधियों एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा भी यदि इस दिशा में सामूहिक पहल की जाती, तो इन मेहनतकश कारीगरों को काफी राहत मिल सकती थी। लेकिन अब तक ऐसी कोई प्रभावी पहल सामने नहीं आने से कुम्हारों को अपनी परेशानियों के बीच ही कारोबार करना पड़ रहा है।
नगर पालिका प्रशासन से जवाबदेही और जिला प्रशासन से कार्रवाई की अपेक्षा –
नगरवासियों एवं स्थानीय कारीगरों के हित में यह आवश्यक है कि नगर पालिका परिषद तत्काल शास्त्री चौक में मिट्टी के दीये बेचने वाले सभी कुम्हारों के लिए टेंट एवं छाया, बैठने की समुचित व्यवस्था, पेयजल और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराए। साथ ही सड़क से हटकर सुरक्षित एवं व्यवस्थित विक्रय स्थल निर्धारित किया जाए, ताकि कुम्हारों को सम्मानजनक वातावरण में अपना व्यवसाय करने का अवसर मिल सके।
जिला कलेक्टर द्वारा जारी निर्देशों के पालन की समीक्षा करते हुए यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि भविष्य में ऐसे आदेश केवल औपचारिकता बनकर न रह जाएं और संबंधित निकाय अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन गंभीरता से करें।
दीपावली का वास्तविक संदेश तभी सार्थक होगा, जब समाज के अंतिम व्यक्ति और मेहनतकश वर्ग के जीवन में भी खुशियों का प्रकाश पहुंचे। जो कुम्हार अपनी मेहनत से हजारों घरों को मिट्टी के दीयों से रोशन कर रहे हैं, क्या उनके हिस्से में थोड़ी सी छाया, बैठने की जगह और पीने का पानी भी नहीं आ सकता? आखिर कलेक्टर के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद अकलतरा नगर पालिका परिषद द्वारा कुम्हारों के लिए आवश्यक इंतजाम क्यों नहीं किए गए? क्या स्थानीय कारीगरों को प्रोत्साहित करने की जिम्मेदारी केवल शासन के आदेश जारी करने तक ही सीमित रह जाएगी?
अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और नगर पालिका परिषद इस गंभीर विषय को कितनी प्राथमिकता देते हैं और मेहनतकश कुम्हारों को राहत पहुंचाने के लिए कब ठोस कदम उठाते हैं।













