116 वर्षों से कृष्ण भक्ति, नाट्यकला और संगीत की अलख जगा रहा नरियरा का श्री राधावल्लभ मंदिर
छत्तीसगढ़ की ‘वृंदावनमयी नगरी’ में 4 सितंबर को मनेगी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, मंदिर परिसर के बाहर सजेगा विशाल मेला
1910 में वृंदावन की तर्ज पर हुआ था मंदिर का निर्माण, आज भी दीवारों पर जीवंत हैं पौराणिक कथाएं, देवी-देवताओं और कला साधकों की अद्भुत कलाकृतिया
सौरभ जैन – छत्तीसगढ़ की धरती अपनी समृद्ध लोक परंपराओं, नाट्यकला, संगीत और धार्मिक संस्कृति के लिए देशभर में विशिष्ट पहचान रखती है। इसी सांस्कृतिक विरासत में जांजगीर-चांपा अंचल का नरियरा गांव अपने आप में एक अनूठा अध्याय समेटे हुए है। यहां भक्ति, संगीत, नृत्य और नाट्यकला की ऐसी परंपरा विकसित हुई, जिसने नरियरा को कालांतर में ‘छत्तीसगढ़ की वृंदावनमयी नगरी’ के रूप में पहचान दिलाई।
नरियरा स्थित श्री राधावल्लभ मंदिर में पिछले 116 वर्षों से श्रीकृष्ण जन्माष्टमी उत्सव धूमधाम और धार्मिक श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। इस वर्ष भी 4 सितंबर को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना एवं धार्मिक आयोजन होंगे तथा मंदिर परिसर के बाहर विशाल मेले का आयोजन किया जाएगा। जन्माष्टमी के अवसर पर नरियरा में एक बार फिर श्रद्धा, भक्ति, कला और संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिलेगा।
1910 में वृंदावन की तर्ज पर हुआ श्री राधावल्लभ मंदिर का निर्माण
नरियरा के श्री राधावल्लभ मंदिर का इतिहास अत्यंत गौरवशाली और समृद्ध रहा है। उपलब्ध ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार नरियरा के मालगुजार ठाकुर दरबार सिंह के चार पुत्र—भैरो प्रसाद सिंह, कौशल प्रसाद सिंह, ठुनु सिंह एवं सबसे छोटे पुत्र सगुन सिंह—ने अपनी माता की सहमति से वर्ष 1910 में श्री राधावल्लभ मंदिर का निर्माण करवाया था।
वृंदावन से परिवार के पुराने एवं गहरे संबंध को देखते हुए मंदिर का निर्माण भी वृंदावन की धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं को ध्यान में रखकर कराया गया। उस दौर में नरियरा में इस प्रकार के भव्य मंदिर का निर्माण केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं था, बल्कि यह कला, स्थापत्य और संस्कृति के संरक्षण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण पहल थी।
मंदिर के समीप भव्य एवं विशाल सिंह द्वार का निर्माण कराया गया। सिंह द्वार पर दो शेरों की प्रतिमाएं स्थापित की गईं और मंदिर का निर्माण करवाने वाले परिवार का नाम भी अंकित किया गया। यह सिंह द्वार आज भी नरियरा के गौरवशाली इतिहास और तत्कालीन स्थापत्य वैभव की गवाही देता है।
बांके बिहारी मंदिर की तर्ज पर अष्टधातु की राधा-कृष्ण प्रतिमा –
श्री राधावल्लभ मंदिर में वृंदावन के विश्व प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर की धार्मिक परंपरा एवं स्वरूप से प्रेरित होकर अष्टधातु से निर्मित भव्य राधा-कृष्ण प्रतिमाओं की स्थापना की गई। मंदिर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी एवं रथयात्रा जैसे पावन अवसरों पर भगवान राधा-कृष्ण का विशेष श्रृंगार किया जाता है।
विशेष अवसरों पर राधा-कृष्ण का स्वर्ण श्रृंगार आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहता है। धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-अर्चना और भक्ति संगीत से मंदिर परिसर का वातावरण पूरी तरह कृष्णमय हो उठता है।
मंदिर की दीवारों पर बोलती है पौराणिक कथाओं और कला की भाषा –
श्री राधावल्लभ मंदिर केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर नाट्यकला और चित्रकला की दुर्लभ विरासत भी समेटे हुए है। मंदिर के अंदर की दीवारों पर वृंदावन एवं जबलपुर से आए कलाकारों द्वारा हिंदू पौराणिक कथाओं, देवी-देवताओं, गंधर्वों, अप्सराओं, जातक कथाओं और नर्तकियों की मनोहारी कलाकृतियां बनाई गईं।
इन कलाकृतियों की विशेषता यह है कि इनमें धार्मिक आख्यानों के साथ-साथ नरियरा की सांस्कृतिक विरासत और उससे जुड़े प्रमुख व्यक्तित्वों को भी स्थान दिया गया। मंदिर में ठाकुर दरबार सिंह के चारों पुत्रों भैरो प्रसाद सिंह, कौशल प्रसाद सिंह, ठुनु सिंह एवं सगुन सिंह की कलाकृतियां बनाई गईं।
इसके अलावा प्रसिद्ध संगीतज्ञ विश्वेश्वर सिंह के गुरु पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर की कलाकृति भी मंदिर की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई ये कलाकृतियां आज भी आने वाली पीढ़ियों को नरियरा के कला और संगीत के स्वर्णिम अतीत से परिचित कराती हैं।
जहां संगीतज्ञ, विद्वान और साधु-संत आकर साधना करते थे –
एक समय श्री राधावल्लभ मंदिर केवल धार्मिक गतिविधियों तक सीमित नहीं था। यह संगीतज्ञों, विद्वानों, साधु-संतों और कला साधकों का भी महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करता था। दूर-दूर से कला एवं संगीत के साधक नरियरा पहुंचते और मंदिर परिसर में रहकर अपनी साधना एवं अध्ययन करते थे।
मंदिर परिसर में संगीत और कला की शिक्षा का वातावरण ऐसा था कि नरियरा ने कई प्रतिभाओं को प्रभावित किया। प्रख्यात फिल्म अभिनेत्री एवं गायिका सुश्री सुलक्षणा पंडित ने भी नरियरा में अपनी प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने के साथ संगीत और कला की शिक्षा प्राप्त की। इस तरह नरियरा की सांस्कृतिक मिट्टी ने फिल्म और संगीत जगत तक अपनी छाप छोड़ी।
1925 से 1952 तक गूंजती रही रासलीला की स्वर-लहरियां –
नरियरा के श्री राधावल्लभ मंदिर की पहचान लंबे समय तक रासलीला और कृष्णलीला के भव्य आयोजनों से रही। वर्ष 1925 से 1952 तक मंदिर के प्रांगण में प्रतिवर्ष कृष्णलीला के साथ रासलीला कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे।
इन आयोजनों में अंचल के अनेक ख्यातिप्राप्त कलाकारों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया। कोटमीसोनार के श्यामलाल चतुर्वेदी, रतनपुर के राधेश्याम, ताराचंद व्यास, रामकृष्ण पांडेय, रामजी सिंह सहित अनेक क्षेत्रीय कलाकार रासलीला की परंपरा से जुड़े रहे।
नरियरा की रासलीला इतनी प्रसिद्ध थी कि आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग इसे देखने पहुंचते थे। आयोजन के दौरान गांव में मेले जैसा वातावरण निर्मित हो जाता था। बाहर से आने वाले मेहमानों के कारण गांव के घरों में भी जगह कम पड़ जाती थी। ग्रामीण परिवार अतिथियों का स्वागत-सत्कार करते और पूरा नरियरा कृष्ण भक्ति एवं सांस्कृतिक उत्सव में डूब जाता था।
रायगढ़ घराने के कलाकारों ने भी नरियरा में बिखेरी कला की छटा –
नरियरा की रासलीला ने केवल स्थानीय कलाकारों को ही मंच नहीं दिया, बल्कि प्रदेश की प्रसिद्ध कला परंपराओं से जुड़े कलाकारों को भी यहां अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर मिला। रायगढ़ घराने के प्रख्यात कत्थक नर्तक कार्तिकराम, रासधारी ठाकुर एवं दादू सिंह ने भी नरियरा में आयोजित रासलीला के माध्यम से अपनी कला का प्रदर्शन किया और अंचल में ख्याति अर्जित की।
इससे नरियरा का नाम छत्तीसगढ़ की नाट्य एवं संगीत परंपरा में और अधिक प्रतिष्ठित हुआ। यहां धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नृत्य, संगीत, अभिनय, चित्रकला और लोक संस्कृति के माध्यम से जीवंत होता रहा।
वृंदावन से परिवार का रहा है सदियों पुराना आत्मीय संबंध –
नरियरा को वृंदावनमयी नगरी कहे जाने के पीछे केवल मंदिर निर्माण ही कारण नहीं है, बल्कि इसके पीछे ठाकुर दरबार सिंह के परिवार का वृंदावन से पुराना और गहरा संबंध भी रहा है।
ठाकुर दरबार सिंह की क्षेत्र के करीब 13 ग्रामों में मालगुजारी थी। इसके साथ ही परिवार की वृंदावन में भी भूमि एवं संपत्तियां थीं। परिवार के कौशल सिंह ‘मझला गोटिया’ ने अपने जीवन का अंतिम समय वृंदावन स्थित परिवार के पैतृक घर में बिताया, जो बांके बिहारी मंदिर के समीप बताया जाता है। उन्होंने वृंदावन में ही अंतिम सांस ली।
स्थानीय एवं पारिवारिक परंपरा के अनुसार वृंदावन के बड़े-बुजुर्ग आज भी कौशल सिंह को ‘ठाकुर बाबा’ के नाम से स्मरण करते हैं। परिवार का वृंदावन से यह पुराना संबंध ही नरियरा में वृंदावन की धार्मिक एवं सांस्कृतिक छवि को स्थापित करने की प्रेरणा बना।
बदलते समय के साथ बदला आयोजन का स्वरूप, पर कायम रही परंपरा –
समय के साथ सामाजिक परिस्थितियां और मनोरंजन के साधन बदले। रासलीला के पुराने स्वरूप में परिवर्तन आया, लेकिन नरियरा की कृष्ण भक्ति और सांस्कृतिक परंपरा समाप्त नहीं हुई। आज भी सावन झूला उत्सव और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
श्री राधावल्लभ नाटक कला एवं संगीत समिति इस ऐतिहासिक परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। हर वर्ष जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिर में विशेष धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं और बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
4 सितंबर को कृष्णमय होगा नरियरा –
इस वर्ष 4 सितंबर को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर नरियरा का श्री राधावल्लभ मंदिर एक बार फिर श्रद्धा और आस्था का प्रमुख केंद्र बनेगा। मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण का विशेष पूजन, श्रृंगार एवं धार्मिक अनुष्ठान होंगे। वहीं मंदिर परिसर के बाहर विशाल मेले का आयोजन किया जाएगा, जिसमें आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और लोगों के पहुंचने की संभावना है।
116 वर्षों की यह परंपरा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि नरियरा की ऐतिहासिक स्मृति, पारिवारिक विरासत, धार्मिक आस्था और नाट्य-संगीत संस्कृति का जीवंत दस्तावेज है।
धरोहर को संरक्षित करने की जरूरत –
नरियरा का श्री राधावल्लभ मंदिर आज भी उस दौर की याद दिलाता है, जब मंदिर केवल पूजा के स्थान नहीं बल्कि कला, साहित्य, संगीत, नृत्य और सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना के केंद्र हुआ करते थे। मंदिर की दीवारों पर मौजूद कलाकृतियां, राधा-कृष्ण की अष्टधातु प्रतिमाएं, सिंह द्वार और रासलीला की ऐतिहासिक परंपरा नरियरा को प्रदेश की अन्य धार्मिक नगरी से अलग पहचान प्रदान करती है।
नरियरा की यह विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर है। यदि इस ऐतिहासिक मंदिर, इसकी कलाकृतियों, रासलीला की परंपरा और इससे जुड़े कलाकारों के इतिहास का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण एवं संरक्षण किया जाए, तो नरियरा को छत्तीसगढ़ के प्रमुख धार्मिक, नाट्य एवं संगीत पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।
116 वर्षों से निरंतर जल रही भक्ति, कला और संगीत की यह ज्योति आज भी नरियरा को वृंदावन की सांस्कृतिक अनुभूति कराती है। यही कारण है कि नरियरा को केवल एक गांव के रूप में नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की ‘वृंदावनमयी नगरी’ के रूप में याद किया जाता है।
